Anant Chaturdashi Katha की सुनने और व्रत रखने से आपके सारे दुःख और दर्द दूर हो जायेगे ।अनंत चतुर्दशी भारत में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं जिसको जैन और हिन्दू  जाति के लोग मुख्य रूप से मनाते हैं । अनंत  चतुर्दशी चंद्र पखवाड़े का 14 वां दिन है। पौराणिक मान्यता है की  इस व्रत को जो कोई भी अगर लगातार 14 सालों तक करता हैं तो उसे विष्णु लोक की प्राप्ति होगी। अनंत चतुर्दशी गणेश चतुर्थी के 10 दिन बाद होती हैं और अनंत चतुर्दशी को अनंत चौदस के नाम से भी जाना जाता हैं  । अनंत चतुर्दशी पर मुख्यता श्री विष्णु भगवान की पूजा होती हैं और इस दिन गणेश विसर्जन करने से अनंत और मन चाहे फल की प्राप्ति होती हैं  । 

इस दिन सभी लोग व्रत भी रखते हैं और ईश्वर से सुख और  समृद्धि की याचना करते हैं । अनंत चतुर्दशी भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है।  भारत में इस पर्व का बहुत महत्व हैं और कई राज्यों में पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता हैं । भारत ऋषि और मुनियों का देश हैं जहाँ पर भगवान में लोगो की श्रद्धा सबसे ज्यादा हैं । भारत के हर घर में पूजा – पाठ और भक्ति भाव का संगम देखने को मिलेगा । भगवान को ना जाने कितने तरीको से पूजा पाठ करके प्रसन्न करने का प्रयास किया जाता हैं ।

lord vishnu anant katha
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अनंत चतुर्दशी 2020 पूजा का दिनांक और शुभ मुहूर्त

इस बार  २०२० की अनंत चतुर्दशी  1 सितंबर, मंगलवार को हैं ।  सुबह 5 बजकर 59 मिनट से 9 बजकर 40 मिनट तक

गणेश विसर्जन 2020 का शुभ मुहूर्त

सुबह 9 बजकर 10 मिनट से दोपहर में 1 बजकर 56 मिनट तक

अनंत चतुर्दशी पूजा करने  की सही विधि

अग्नि पुराण में अनंत चतुर्दशी व्रत के महत्व  के बारे में बताया गया हैं ।  इसकी पूजा विधि इस प्रकार से हैं –

  • सूर्योदय के पहले उठकर पूजा घर और अपने घर को सही से साफ़ – सुथरा कर ले , आप चाहे तो अपनी सुविधा के हिसाब से पूजा घर एक दिन पहले ही साफ़ कर ले ।
  • अनंत चतुर्दशी के दिन सबसे पहले सुबह सूर्योदय के पहले उठकर नहा ले और पूजा के लिए तैयार हो जाए।
  • पूजा के लिए सबसे पहले पूजा स्थान पर या अपने घर के मंदिर के सामने  पर कलश रखे और इसके बाद कलश पर श्री  विष्णु भगवान जी की फोटो लगा ले ।
  • चाहे तो आप पीला घागा ले ले या फिर आप  एक सफ़ेद धागे को कुमकुम, केसर और हल्दी से रंगकर चौदह गांठें लगाकर एक अनंता बनाएं, और इसे श्री विष्णु भगवान  की फोटो के सामने रखकर पूजा करें और नीचे दिए गए हुए  मंत्र का उच्चारण करते रहे।

“अनंत संसार महासुमद्रे मग्रं समभ्युद्धर वासुदेव।

अनंतरूपे विनियोजयस्व ह्रानंतसूत्राय नमो नमस्ते।।’

मंत्र का उच्चारण आप 7 बार या 21 बार कर सकते हैं। 

जो आपने विष्णु भगवान की फोटो के सामने अनंता रखा था उसे पूजा के परान्त उठाकर अपने हाथ की बाजू में बाँध लीजिये।  श्री विष्णु भगवान जी संकट हारता आपकी सभी मनोकामना पूरी करेंगे ।

अनंत चतुर्दशी की कथा

एक बार की बात हैं जब महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया और उस समय जो  यज्ञ मंडप का निर्माण हुआ था वह इतना  सुंदर और  अद्भुत था की जल व थल की भिन्नता ही पता नहीं चल पा रही थी । इसी से सम्बन्धी एक वाक्या हैं जब  दुर्योधन कही से उस यज्ञ  मंडप की तरफ आ रहे थे और अचानक उस मंडप को देखकर एक तालाब को स्थान समझकर घबराकर उसमे गिर गए उसी समय द्रौपदी भी वह पर खड़ी थी और वह यह  दृश्य देखकर जोर – जोर से हसने लगी और दुर्योधन को अंधों की संतान अंधी कह कर उनका उपहास किया। इससे दुर्योधन को बहुत गुसा आ गया और यह बात उसके हृदय में एक बाण की भांति जा लगी और वह मन ही मन द्रोपदी से बदला लेने के लिए नयी – नयी योजना बनाने लगा ।  इस घटना के बाद दुर्योधन इस बात को एक पल के लिए भी अपने मन से हटा नहीं पाया ।

उसने द्रौपदी और  पांडवों से बदला लेने के लिए  द्यूत-क्रीड़ा  का आयोजन करवाया और उसमे उन्हें  पराजित कर दिया। और पराजित होने पर जो दुर्योधन द्वारा बनाये गए नियमो का पांडवो को पालन करना पड़ा । पांडवों ने  बारह वर्ष का  वनवास भोगा और सालो तक बहुत कष्ट सहे।  एक  दिन की बात हैं जब भगवान कृष्ण उनसे मिलने जंगल में आये,  तब युधिष्ठिर ने कृष्णा जी से अपने दुखो की चर्चा की और उनसे इन दुखों से बाहर निकलने के उपाय भी पूछे ।

 युधिष्ठिर की  पूरी बात को सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा- ‘हे युधिष्ठिर! तुम विधिपूर्वक और पूरी श्रद्धा से अनंत भगवान का व्रत और पूजा करो, जिसको करने से तुम्हारे दुःख तो दूर होंगे ही और तुम्हारा हारा हुआ राज्य भी तुम्हे वापस मिल जाएगा ।

इस संदर्भ में श्रीकृष्ण भगवान जी ने उन्हें एक कथा सुनाई –

प्राचीन काल में एक नेक तपस्वी ब्राह्मण था। जिसका नाम सुमंत था और उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था। सुमंत और दीक्षा की एक परम सुंदरी धर्मपरायण तथा ज्योतिर्मयी कन्या थी। जिसका नाम सुशीला था। सुशीला के बड़े होते ही उसके माँ की मृत्यु हो गयी और सुशीला अपनी माँ की मृत्यु से बहुत अकेली पड़ गयी । सुमंत ने अपनी पत्नी के  मरने के बाद कर्कशा नाम की एक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया।

थोड़े दिनों के बाद  सुशीला का विवाह ब्राह्मण सुमंत ने कौंडिन्य ऋषि के साथ कर दिया। जब  विदाई में कुछ देने की बात आयी तो कर्कशा (सुशीला की सौतेली माँ ) ने दामाद को कुछ ईंटें और पत्थरों के टुकड़े बांध कर दे दिए।

कौंडिन्य ऋषि दुखी होकर अपनी पत्नी को वहा से लेकर अपने आश्रम की ओर चल पड़े  और चलते – चलते रास्ते में ही रात हो गई और  वे दोनों नदी तट पर आराम करने लगे। तभी सुशीला ने देखा- वहां पर बहुत-सी स्त्रियां सुंदर वस्त्र धारण कर पूरे श्रृंगार में किसी देवता की पूजा पर रही है । सुशीला उनके पास गयी और उनसे इस पूजा की विधि और महत्व के बारे में जाना ।  सुशीला ने वहीं उसी समय व्रत का विधि – विधान से अनुष्ठान किया और चौदह गांठों वाला डोरा (अनंता )  हाथ में बांध कर ऋषि कौंडिन्य के पास वापस आ गई।

जब कौंडिन्य ने सुशीला से अनंता के बारे में पूछा तो उसने सारी बात विस्तार से बताई । लेकिन कौंडिन्य ने सुशीला की बात नहीं मानी और एक दिन  उन्होंने अनंते को तोड़ कर आग  में डाल दिया, इससे भगवान अनंत जी नाराज हो गए और इसके बाद  ऋषि कौंडिन्य बहुत दुखी और परेशान  रहने लगे। उनकी सारी सम्पत्ति रूपया और  पैसा नष्ट हो गया और वह दरिद्र हो गए ।  तब कौंडिन्य ने अपनी पत्नी सुशीला के इसका कारण पूजा तो  सुशीला ने अनंत भगवान का डोरा (अनंता ) जलाने की बात बताई ।  तब कौंडिन्य पश्चाताप करने के लिए और  अनंत डोरे की प्राप्ति के लिए वन में चले गए। वन में कई दिनों तक भटकते रहे और अंत में निराश और दुखी होकर भूमि पर गिर पड़े ।

ये देखकर अनंत भगवान प्रकट हुए और  बोले- ‘हे कौंडिन्य! तुमने मेरा अपमान और  तिरस्कार किया था, इसी कारण तुम्हें इतना कष्ट भोगना पड़ा।

अब तुम्हारे  पश्चाताप से मैं तुमसे प्रसन्न हूं और अब तुम अपने  घर जाकर पूरी विधिपूर्वक अनंत चतुर्दशी का व्रत करो, तुम्हारे सब कष्ट दूर हो जाएंगे  चौदह वर्ष के बाद  व्रत करने से तुम्हारा दुख दूर हो जाएगा और तुम धन-धान्य से संपन्न हो जाओगे। कौंडिन्य ने व्रत और पूजा की और  उन्हें सारे क्लेशों से मुक्ति मिल गई।

श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर ने भी अनंत भगवान का व्रत किया जिसके प्रभाव से पांडव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए तथा चिरकाल तक राज्य करते रहे।

अनंत सूत्र बांधने का मंत्र

“अनंत संसार महासुमद्रे मग्रं समभ्युद्धर वासुदेव।

अनंतरूपे विनियोजयस्व ह्रानंतसूत्राय नमो नमस्ते।।’

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